तीन तलाक पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, यह महिलाओं के प्रति क्रूरता
9/12/2016
NationalDuniya

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि तीन तलाक असंवैधानिक और मुस्लिम महिलाओं के साथ क्रूरता है। यह समाज और देशहित में नहीं है। मुस्लिमों में बहुविवाह-तलाक से जुड़ी दो याचिकाओं पर पिछले माह फैसला लेते हुए अदालत ने यह टिप्पणी की है, जिसका ब्योरा अब सामने आया है।अदालत ने यह टिप्पणी उन दो मामलों में की, जिनमें याचिकाकर्ताओं ने तीन तलाक के आधार पर रिश्ता तोड़कर दूसरा निकाह कर लिया और साथ रहने के लिए पुलिस सुरक्षा की खातिर अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि मुस्लिम समुदाय के सभी वर्ग तीन तलाक को मान्यता नहीं देते, किंतु एक बड़ा मुस्लिम समाज तीन तलाक स्वीकार कर रहा है। यह न केवल संविधान के समानता एवं भेदभावविहीन समाज के मूल अधिकारों के विपरीत है।यह टिप्पणी है, फैसला नहीं न्यायमूर्ति सुनीत कुमार की एकल पीठ ने पांच नवंबर के आदेश में स्पष्ट किया कि वह मुस्लिमों में शादी और तलाक की वैधता पर कोई फैसला नहीं दे रही है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में इससे जुड़ा मामला लंबित है। कोर्ट ने इसे अपना आब्जर्वेशन बताया।मुस्लिम औरतों को निजी कानूनों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता कोर्ट ने कहा कि पंथनिरपेक्ष देशों में संविधान के तहत आधुनिक कानून सामाजिक बदलाव लाते हैं। भारत में भी संख्या में मुसलमान रहते हैं। लेकिन मुस्लिम औरतों को पुराने रीतिरिवाजों और सामाजिक मान्यताओं वाले निजी कानूनों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।पर्सनल लॉ संविधान से ऊपर नहीं
कोर्ट ने कहा है कि पवित्र कुरान में पति पत्नी के बीच सुलह के सारे प्रयास विफल होने की दशा में ही तलाक या खुला का नियम है। किंतु कुछ लोग कुरान की मनमानी व्याख्या करते हैं। पर्सनल लॉ संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के ऊपर नहीं हो सकता।

 
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