उत्तराखंड चुनाव: बीजेपी को मुद्दे नहीं मोदी का सहारा
8/2/2017
NationalDuniya

सर्दी की अलसाई सुबह. दिल्ली से उत्तराखंड में प्रवेश करते ही गहरी धुंध की चादर में लिपटी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की इठलाती हुई तस्वीरों वाली बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स चुनावी फिजा की दस्तक देती हैं. लेकिन ''पहाड़ की जवानी और पहाड़ का पानी पहाड़ के काम नहीं आते'' यानी पलायन रोकने का भरोसा देने वाले प्रधानमंत्री के बयान पर शायद जनता को एतबार नहीं. गढ़वाल के श्रीनगर विधानसभा क्षेत्र के चौंरीखाल में सड़क के किनारे किराए की दुकान लेकर चाय बेचने वाले बुजुर्ग दंपती जगतराम और शशिकला धस्माना का बेटा पुणे में नौकरी करता है. शशिकला कहती हैं, ''हम 35 साल से यहां दुकान चला रहे हैं, लेकिन न पानी की सुविधा है और न रोजगार. इसलिए बेटे को जबरन बाहर भेज दिया ताकि उसका भविष्य खराब न हो.'' धस्माना दंपती को किसी भी राजनैतिक दल पर भरोसा नहीं. वे कहते हैं, ''हर बार चुनाव में नेता आते हैं, वादा करके चले जाते हैं. वोट किसी भी दल को नहीं देना चाहते, लेकिन मजबूरी है सो देना होगा. पुरानों को देख लिया, नए को भी मौका देकर देखेंगे.'' पहाड़ से पलायन को रेखांकित करने वाली ऐसी कहानियां जनता के दिलों में आम हैं पर नेताओं के एजेंडे में नहीं दिख रहीं. जबकि पर्वतीय राज्य के नाम पर हुए उत्तराखंड के गठन से अब तक अनुमान के मुताबिक 32 लाख लोगों का पलायन हो चुका है.

 
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