जरूरतमंद मरीजों के लिए हरदम सेवा में जुटा एक शख्स
12/1/2015
NationalDuniya
बिशन पपोला नेशनल दुनिया नोएडा। डूबते को तिनके का सहारा। यह कहावत उन लोेगों के लिए काफी मायने रखती है, जो संकट या लाचारी में होते हैं। बस जरूरत होती है कि उन्हें तिनके का भी सहारा मिल जाए तो उनका उद्घार हो जाएगा। महेन्द्र सरीन कुछ ऐसी ही समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए सहारा बने हुए हैं। उनके सहयोग से जिला अस्पताल में इलाज कराने आने वाले न जाने कितने गरीब, लाचार और बेसहारा लोग बगैर मायूसी के इलाज कराकर जाते हैं। किसी भी मरीज के पास थोड़ी-बहुत भी पैसों या दवाइयों की कमी रह जाती है तो उसे महेन्द्र सरीन पूरा कर देते हैं। अकेले दम पर उनका यह मिशन पिछले 14 वर्षों से चल रहा है। वह 83 वर्ष की उम्र में भी प्रत्येक दिन जिला अस्पताल जाते हैं और लाचार, गरीब और बेसहारा मरीजों की मदद करते हैं। उनके पास चाहे किसी प्रकार की कमी क्यों न हो, उसे वह पूरा कर देते हैं। किसी के पास दवा नहीं है तो उसे दवा लाकर देते हैं। किसी के पास आॅपरेशन का सामान लाने के लिए पैसे कम पड़ रहे हैं तो वह उस कमी को भी दूर कर देते हैं। इलाज के बाद किसी के पास घर जाने के लिए पैसे नहीं रहते तो उसकी कमी भी पूरी करते हैं। इसी तरह के न जाने कितने वाकए आए दिन होते हैं। उनके निस्वार्थ सेवा भाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह मदद के दौरान न किसी मरीज का नाम पूछते हैं और न ही उसे कितने पैसे दिए इसका कोई हिसाब रखते हैं। तकनीकी और दिखावा भरे समाज में रहने के बाद भी महेन्द्र सरीन बेहद सादगी भरा जीवन जीते हैं। न वह मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं और न ही कार का। रिक्शे की सवारी कर वह सुबह साढ़े दस बजे सेक्टर-30 स्थित जिला अस्पताल पहुंच जाते हैं और दोपहर एक बजे तक जरूरतमंद मरीजों की सहायता करते हैं। अस्पताल काउंटर पर भी उन्होंने बताया है कि अगर, कोई जरूरतमंद मेरी अनुपस्थिति में आता है तो मुझे बता दिया जाए, जिससे वह सहायता के लिए वहां आ सकें। अलग सोच का नतीजा: अधिकांश लोग अपने बिजनेस व बड़े ओहदे से सेवानिवृत्त होने के बाद गोल्फ कोर्स व होटलों का रुख करते हैं। महेन्द्र सरीन भी बड़े कारोबार का संचालन कर सेवानिवृत्त हुए, लेकिन उन्होंने गरीबों, लाचारों और बेसहारा लोगों की मदद करना ही सेवानिवृत्त के बाद अपने जीने का मकसद चुना, जो जरूरतमंदों के लिए काफी मददगार साबित हो रहा है। प्रतिदिन दो हजार की है ओपीडी: - जिला अस्पताल में प्रतिदिन करीब दो हजार मरीज ओपीडी में आते हैं। यहां अधिकांश गरीब तबके के ही लोग इलाज कराने के लिए आते हैं। कई बार बहुत से मरीजों को बाहर से टेस्ट कराने व दवाइयां लानी पड़ती हैं। अगर, किसी की जेब में पैसा नहीं है तो उसका आगे इलाज संभव नहीं हो पाता है, लेकिन महेन्द्र सरीन ऐसा नहीं होने देते। ऐसे जरूरतमंदों की सहायता के लिए वह हर समय खड़े रहते हैं। घर जाने तक का करते हैं इंतजाम: कई बार पागल औरतों को डिलीवरी अस्पताल में होती है। उनके साथ कोई नहीं होता। बच्चे के लिए दूध व अन्य चीजों की जरूरत पड़ जाती है। इसके अलावा कई लोग दूसरे राज्यों से नौकरी की तलाश में यहां आते हैं। दुर्भाग्यवश कुछ लोग एक्सीडेंट का शिकार हो जाते हैं। पुलिस भी उन्हें ऐसे ही छोड़कर चली जाती है। उनकी जेब में न तो इलाज के लिए पैसा होता है और न ही घर जाने के लिए। महेन्द्र सरीन उनका इलाज भी करवाते हैं और उनके घर जाने तक के पैसे का इंतजाम स्वयं करते हैं। नहीं लेते डोनेशन: सेवा के लिए चल रहे अनेक एनजीओ डोनेशन लेते हैं। कुछ खास लोगों को छोड़ दें तो महेन्द्र सरीन अन्य किसी से भी डोनेशन नहीं लेते हैं, हालांकि बहुत से लोग उनके पास डोनेशन के लिए आते हैं। वह एनजीओ भी खोल सकते थे, लेकिन एनजीओ के नाम पर कुछ लोग जिस प्रकार कमाई के लिए बदनाम हो रहे हैं, सरीन उससे हमेशा दूर रहे और स्वयं के बल पर निरंतर मरीजों की सहायता में जुटे हुए हैं। यह बहुत अच्छी सोच है। अगर, सभी ऐसा सोचने लगें और गरीब, लाचार व बेसहारा लोगों की मदद के लिए आगे आएं तो न तो गरीबी रहेगी और न ही पैसों के अभाव में किसी गरीब का इलाज रुकेगा देशराज, मरीज हर दिन निश्चित समय में वह यहां पहुंच जाते हैं। यहां इलाज के लिए आने वाले अधिकतर लोग अभावग्रस्त होते हैं। ऐसे में उन्हें ऐसी सोच रखने वाले लोगों की जरूरत होती है। लगातार उनके इस मिशन में जुटे रहना अपने-आप में बहुत बड़ी बात है। बनवारी लाल, अस्पताल कर्मी कोई व्यक्ति कुछ भी करता है तो उसके पीछे बस भगवान का हाथ होता है। भगवान की कृपा से ही अच्छा काम करने का रास्ता मिलता है। मैं 40 साल से गीता पढ़ रहा हूं। गीता में जो बताया गया है, मैं वही करने का प्रयास कर रहा हूं महेन्द्र सरीन, जाने-माने समाजसेवी

 
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