स्टोरी टाइम प्रोजेक्ट मेट्रो
22/1/2015
NationalDuniya

ला मोटूमल जैसे ही गोदाम का दरवाजा बंद करके वापस मुड़े कि सारे चूहे निकल-निकल कर बाहर आ गए। कोई लंबा कोई छोटा, कोई दुबला कोई मोटा, कोई बड़ी-बड़ी मूछोंवाला, कोई लाल-लाल आंखोंवाला, कोई सुस्त कोई चुस्त। सब इकट्ठे होकर चिर्र-चिर्र-टुस-टुस करके बहस करने लगे। उनका शोर सुन कर एक कम उम्र, लेकिन सयाना चूहा बोरियों के ढेर पर चढ़कर चीखा,भाइयो, अगर हम लोग इसी तरह शोर मचाते रहे, तो सुलझ चुकी समस्या। शोर सुनकर लाला अपनी बिलौटी वापस छोड़ जाएगा। फिर छिपते फिरना सब इधर-उधर। उसकी बात पर सारे चूहे एकाएक खामोश हो गए। दरअसल, लाला मोटूमल कुछ ही दिनों पहले चूहों से परेशान होकर एक बिल्ली ले आया था। मोटी-ताजी बिलौटी दिनभर इधर से उधर घूमा करती। मोटी-ताजी होकर भी वह इतनी फुर्तीली थी कि जिस पर नजर पड़ती, उसका काम तमाम समझो। बच्चे और बूढ़े हो चले चूहों का तो निकलना हराम हो गया था। तो फिर हमें क्या करना चाहिए? एक बूढ़े चूहे ने मूंछें लटकाते हुए पूछा। यही तो हम सब यहां सोचने के लिए इकट्ठा हुए हैं। मिल कर सोचेंगे तो कोई न कोई हल जरूर निकल आएगा।नौजवान चूहे ने कहा। हमें उसके गले में घंटी बांधने की कोशिश करनी चाहिए। हमारे पुरखों ने भी एक बार यही किया था। एक चूहे ने सलाह दी तो सब हंस पड़े। नौजवान चूहे ने कहा,दादा, अब जमाना बहुत आगे निकल चुका है। घंटी बांधने से समस्या हल नहीं होगी। और फिर शैतान की नानी के गले में घंटी बांधेगा कौन? तभी एक चूहा बीच में आकर बड़ी-बड़ी मंूछें हिलाते हुए बोला,मैं तो कहता हूं हर वक्त सिर पर मंडराते खतरे के बीच रहना समझदारी नहीं है। हमें यह जगह छोड़ देनी चाहिए। खबरदार, ऐसा कभी सोचना भी मत,एक बूढ़े और सुस्त हो चले चूहे ने यकायक जोश में आकर उसे डांटा, हम यहीं पैदा हुए, यहीं खेले-कूदे। पुरखों ने यहीं बोरियां काट-काट कर हमारा पेट पाला। यहीं लाला की नाक में दम करके हम बड़े हुए। इसे छोड़ कर और कहां जा सकते हैं? सबने बूढ़े चूहे की हां में हां मिलाई कि पुरखों का घर छोड़ कर भागना कोई समझदारी नहीं। समस्या से भागना तो कायरता है। बड़ी देर तक बहस चलती रही, पर कोई हल न निकला। तभी गोदाम का दरवाजा खुलने की आवाज आई। पुराने किवाड़ों की चर्र...चूं सुनते ही चूहों में भगदड़ मच गई। जिसने जहां जगह पाई भाग कर छिप गया। लाला दरवाजे पर खड़ा कह रहा था, देखो, गोदाम का दरवाजा बंद मत करना, बिलौटी को यहीं घूमते रहने देना। इन चूहों को कुछ तो सबक मिले। लाला की बात सुन कर सब समझ गए कि अब दिन भर की छुट्टी। और रात की भी कौन कहे। इस कमबख्त बिलौटी को तो रात में भी नींद नहीं पड़ती। कंचे जैसी चमकती आंखें लिए इधर-उधर मंडराती रहती है। दिन बीतते गए और चूहों की समस्या जस की तस बनी रही। कुछ दिनों बाद रेलवे से लदकर लाला के गोदाम में गेहूं की बोरियां आर्इं। मौका देख कर जब चूहे बोरियों में सेंध लगाने पहुंचे तो हैरान रह गए। एक बोरी में एक चूहा छिपा बैठा था। रंग-रूप से भी वह यहां का रहने वाला नहीं लगता था। पल भर में गोदाम के सारे चूहे इकट्ठे हो गए और कौतूहल से उसे निहारने लगे। पूछताछ पर उसने बताया कि वह महानगर के रेलवे स्टेशन पर रहता है। एक दिन जब वह गोदाम की बोरियों में घुसा ताजा गेहुंओं की दावत उड़ा रहा था, उसी समय मजदूरों ने बोरी उठाकर ट्रेन में लाद दी और वह यहां आ पहुंचा। बाप रे, बाप, तुम तो बड़ा लंबा सफर तय करके आए हो,एक चूहे ने कौतूहल से कहा। और नहीं तो क्या..परदेसी चूहा अपना सिर पकड़ता हुआ बोला, चौबीस घंटे ट्रेन की खट-खट फट-फट से माथा भन्ना गया। कान सुन्न हो गए। हाथ-पैरों की ऐसी जान निकल रही है कि बिल्ली दौड़ा ले, तो दो कदम भागना मुश्किल हो। बिल्ली का नाम आते ही सबके चेहरे उतर गए। परदेसी चूहे को बड़ी हैरत हुई। उसने पूछा, क्या हुआ बिल्ली का नाम आते ही तुम सबके चेहरों पर बारह क्यों बज गए? नौजवान चूहे ने आगे बढ़ कर सारी बात बता दी। परदेसी चूहा पहले तो गंभीरता से सारी बात सुनता रहा, पर जब बात खत्म हुई तो ठठा कर हंस पड़ा, तुम लोग यहां सिर्फ एक बिलौटी से डर कर बैठे हो। हम लोग रेलवे स्टेशन पर न जाने कौन-कौन सी मुसीबतों का सामना करते हैं पर हम लोग कर भी क्या सकते हैं,एक बूढ़े चूहे ने कहा। अगर तुम सब साथ दो तो मैं तुम्हें इस समस्या से छुटकारा दिला सकता हूं।परदेसी चूहा बोला,थोड़ा वक्त और मेहनत जरूर लगेगी। पर ऐसा पक्का इंतजाम करूंगा कि देखते रह जाओगे। अगले ही दिन से उसके बताए अनुसार गोदाम में काम शुरू हो गया। सारे चूहे जी-जान से काम में जुट गए। किसी को रात-दिन की परवाह न रही। आखिरकार हफ्ते भर की जी-तोड़ मेहनत के बाद चूहों का प्रोजेक्ट मेट्रो पूरा हो गया। चूहों ने घर के अंदर ही अंदर अपनी मेट्रो लाइन बना डाली थी। गोदाम से शुरू होकर वह लाइन ड्राइंगरूम स्टेशन, स्टोररूम स्टेशन और डायनिंग टेबल हाल्ट के नीचे से गुजरते हुए किचन जंक्शन पर कई लाइनों में बंट जाती थी। अब चूहों को कोई खतरा नहीं था। बच्चे और बूढ़े भी आराम से मेट्रो लाइन के रास्ते आने-जाने लगे थे। बेचारी बिलौटी...! अब दिन भर बैठकर उबासियां लेने के अलावा उसके पास और कोई काम नहीं बचा था। ला मोटूमल जैसे ही गोदाम का दरवाजा बंद करके वापस मुड़े कि सारे चूहे निकल-निकल कर बाहर आ गए। कोई लंबा कोई छोटा, कोई दुबला कोई मोटा, कोई बड़ी-बड़ी मूछोंवाला, कोई लाल-लाल आंखोंवाला, कोई सुस्त कोई चुस्त। सब इकट्ठे होकर चिर्र-चिर्र-टुस-टुस करके बहस करने लगे। उनका शोर सुन कर एक कम उम्र, लेकिन सयाना चूहा बोरियों के ढेर पर चढ़कर चीखा,भाइयो, अगर हम लोग इसी तरह शोर मचाते रहे, तो सुलझ चुकी समस्या। शोर सुनकर लाला अपनी बिलौटी वापस छोड़ जाएगा। फिर छिपते फिरना सब इधर-उधर। उसकी बात पर सारे चूहे एकाएक खामोश हो गए। दरअसल, लाला मोटूमल कुछ ही दिनों पहले चूहों से परेशान होकर एक बिल्ली ले आया था। मोटी-ताजी बिलौटी दिनभर इधर से उधर घूमा करती। मोटी-ताजी होकर भी वह इतनी फुर्तीली थी कि जिस पर नजर पड़ती, उसका काम तमाम समझो। बच्चे और बूढ़े हो चले चूहों का तो निकलना हराम हो गया था। तो फिर हमें क्या करना चाहिए? एक बूढ़े चूहे ने मूंछें लटकाते हुए पूछा। यही तो हम सब यहां सोचने के लिए इकट्ठा हुए हैं। मिल कर सोचेंगे तो कोई न कोई हल जरूर निकल आएगा।;नौजवान चूहे ने कहा। हमें उसके गले में घंटी बांधने की कोशिश करनी चाहिए। हमारे पुरखों ने भी एक बार यही किया था। एक चूहे ने सलाह दी तो सब हंस पड़े। नौजवान चूहे ने कहा, दादा, अब जमाना बहुत आगे निकल चुका है। घंटी बांधने से समस्या हल नहीं होगी। और फिर शैतान की नानी के गले में घंटी बांधेगा कौन? तभी एक चूहा बीच में आकर बड़ी-बड़ी मंूछें हिलाते हुए बोला, मैं तो कहता हूं हर वक्त सिर पर मंडराते खतरे के बीच रहना समझदारी नहीं है। हमें यह जगह छोड़ देनी चाहिए।> खबरदार, ऐसा कभी सोचना भी मत,एक बूढ़े और सुस्त हो चले चूहे ने यकायक जोश में आकर उसे डांटा, हम यहीं पैदा हुए, यहीं खेले-कूदे। पुरखों ने यहीं बोरियां काट-काट कर हमारा पेट पाला। यहीं लाला की नाक में दम करके हम बड़े हुए। इसे छोड़ कर और कहां जा सकते हैं? सबने बूढ़े चूहे की हां में हां मिलाई कि पुरखों का घर छोड़ कर भागना कोई समझदारी नहीं। समस्या से भागना तो कायरता है। बड़ी देर तक बहस चलती रही, पर कोई हल न निकला। तभी गोदाम का दरवाजा खुलने की आवाज आई। पुराने किवाड़ों की चर्र...चूं सुनते ही चूहों में भगदड़ मच गई। जिसने जहां जगह पाई भाग कर छिप गया। लाला दरवाजे पर खड़ा कह रहा था, देखो, गोदाम का दरवाजा बंद मत करना, बिलौटी को यहीं घूमते रहने देना। इन चूहों को कुछ तो सबक मिले लाला की बात सुन कर सब समझ गए कि अब दिन भर की छुट्टी। और रात की भी कौन कहे। इस कमबख्त बिलौटी को तो रात में भी नींद नहीं पड़ती। कंचे जैसी चमकती आंखें लिए इधर-उधर मंडराती रहती है। दिन बीतते गए और चूहों की समस्या जस की तस बनी रही। >कुछ दिनों बाद रेलवे से लदकर लाला के गोदाम में गेहूं की बोरियां आर्इं। मौका देख कर जब चूहे बोरियों में सेंध लगाने पहुंचे तो हैरान रह गए। एक बोरी में एक चूहा छिपा बैठा था। रंग-रूप से भी वह यहां का रहने वाला नहीं लगता था। पल भर में गोदाम के सारे चूहे इकट्ठे हो गए और कौतूहल से उसे निहारने लगे। पूछताछ पर उसने बताया कि वह महानगर के रेलवे स्टेशन पर रहता है। एक दिन जब वह गोदाम की बोरियों में घुसा ताजा गेहुंओं की दावत उड़ा रहा था, उसी समय मजदूरों ने बोरी उठाकर ट्रेन में लाद दी और वह यहां आ पहुंचा। बाप रे, बाप, तुम तो बड़ा लंबा सफर तय करके आए हो,एक चूहे ने कौतूहल से कहा। और नहीं तो क्या.परदेसी चूहा अपना सिर पकड़ता हुआ बोला,चौबीस घंटे ट्रेन की खट-खट फट-फट से माथा भन्ना गया। कान सुन्न हो गए। हाथ-पैरों की ऐसी जान निकल रही है कि बिल्ली दौड़ा ले, तो दो कदम भागना मुश्किल हो। बिल्ली का नाम आते ही सबके चेहरे उतर गए। परदेसी चूहे को बड़ी हैरत हुई। उसने पूछा, क्या हुआ बिल्ली का नाम आते ही तुम सबके चेहरों पर बारह क्यों बज गए?

नौजवान चूहे ने आगे बढ़ कर सारी बात बता दी। परदेसी चूहा पहले तो गंभीरता से सारी बात सुनता रहा, पर जब बात खत्म हुई तो ठठा कर हंस पड़ा, तुम लोग यहां सिर्फ एक बिलौटी से डर कर बैठे हो। हम लोग रेलवे स्टेशन पर न जाने कौन-कौन सी मुसीबतों का सामना करते हैं।> पर हम लोग कर भी क्या सकते हैं,एक बूढ़े चूहे ने कहा। अगर तुम सब साथ दो तो मैं तुम्हें इस समस्या से छुटकारा दिला सकता हूं।परदेसी चूहा बोला,थोड़ा वक्त और मेहनत जरूर लगेगी। पर ऐसा पक्का इंतजाम करूंगा कि देखते रह जाओगे। अगले ही दिन से उसके बताए अनुसार गोदाम में काम शुरू हो गया। सारे चूहे जी-जान से काम में जुट गए। किसी को रात-दिन की परवाह न रही। आखिरकार हफ्ते भर की जी-तोड़ मेहनत के बाद चूहों का प्रोजेक्ट मेट्रो पूरा हो गया। चूहों ने घर के अंदर ही अंदर अपनी मेट्रो लाइन बना डाली थी। गोदाम से शुरू होकर वह लाइन ड्राइंगरूम स्टेशन, स्टोररूम स्टेशन और डायनिंग टेबल हाल्ट के नीचे से गुजरते हुए किचन जंक्शन पर कई लाइनों में बंट जाती थी। अब चूहों को कोई खतरा नहीं था। बच्चे और बूढ़े भी आराम से मेट्रो लाइन के रास्ते आने-जाने लगे थे। बेचारी बिलौटी...! अब दिन भर बैठकर उबासियां लेने के अलावा उसके पास और कोई काम नहीं बचा था।
 
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Posted On: May 31 2015 11:18AM
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