बेसहारा बच्चों का सहारा हैं अंजना राजगोपाल
28/1/2015
NationalDuniya

नोएडा। समाज में बहुत से ऐसे बच्चे होते हैं जिनके सिर से मां-बाप का साया उठ जाता है। तब वे ऐसी स्थिति में होते हैं जब उन्हें सहारे की जरुरत होती है। बहुत कम ऐसे लोग होते हैं जो ऐसे बेसहारा बच्चों को सहारा देते हैं, उन्हें अपनाते हैं और उन्हें शिक्षित और संस्कारित करने का बीड़ा उठाते हैं। अंजना राजगोपाल ऐसी ही खास लोगों में शामिल हैं। वह बेसहारा बच्चों को छत देने, शिक्षित करने से लेकर उनकी शादी तक करवाती हैं। इस मिशन के लिए वह 1988 से सार्इं कृपा संस्थान का संचालन कर रही हैं। यहां आने वाले हर बच्चे को वह शिक्षा के साथ-साथ उन्हें व्यवहारिक प्रशिक्षण दिलाती हैं जिससे वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्र हो सकें। बच्चों को शिक्षित व उन्हें व्यवहारिक प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए सार्इं कृपा संस्थान के तहत कई स्कूल और वोकेशनल ट्रेनिंग संस्थान संचालित किए जा रहे हैं। सार्इं कृपा संस्थान में अ 60 बच्चे हैं, जिनकी उम्र दो से लेकर 21 वर्ष तक है। इनमें से स बच्चे विन्न कक्षाओं में अध्ययनरत् हैं। जिनकी उम्र नर्सरी से लेकर दसवीं तक है, वे सेक्टर-134 स्थित वाजिदपुर गांव में चल रहे सार्इं शिक्षा संस्थान में पढ़ रहे हैं। यह संस्थान 1991 से चल रहा है। इसमें सार्इं कृपा संस्थान में रहने वाले बच्चे तो पढ़ते ही हैं, बल्कि गांवों के वे गरीब बच्चेनि:शुल्क शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं जिनके माता-पिता फीस नहीं चुका पाते हैं। यहां पढ़ रहे बच्चों की संख्या लगग 450 है। बड़े उम्र के बच्चों को कॉलेजों से उच्च शिक्षा दिलाई जाती है। इस समय दर्जनों बच्चे स्नातक स्तर की पढ़ाई कर रहे हैं। जो बच्चे सार्इं कृपा संस्थान में नए आते हैं उनके लिए सेक्टर-41 स्थित अग्गापुर में सार्इं बाल संसार नाम से स्कूल चलाया जा रहा है। यहां पढ़ रहे बच्चों की संख्या सैकड़ों में है। सार्इं कृपा संस्थान में रहने वाले 60 बेसहारा बच्चों में से 15 फीसदी लड़के हैं। अन्य लड़कियां हैं, जिनको पुलिस व चाइल्ड लाइन द्वारा यहां पहुंचाया गया। रजत था पहला बच्चा: अंजना राजगोपाल ने सार्इं कृपा संस्थान की शुरुआत 1988 में की थी, लेकिन उन्हें रजत नाम का पहला बच्चा 1990 में मिला। वह उस दौरान आईटीओ स्थित एक बड़े मीडिया हाउस में काम करती थी। तब नौ साल के रजत को कोई सड़क पर पीट रहा था। अंजना राजगोपाल को तब बहुत बुरा लगा और उसे वह अपने साथ ले आर्इं। तब से रजत आज यहीं है और मूकवधिर बच्चों के लिए चल रहे गवती चड्ढ़ा स्कूल में टीम लीडर के तौर पर काम कर रहा है। अच्छी नौकरी का छोड़ा मोह: बेसहारा बच्चों को छत देने के जुनून में अंजना राजगोपाल ने एक बड़े मीडिया हाउस की नौकरी छोड़ दी। अविवाहित अंजना ने शुरुआती तीन वर्षों के दौरान स्वयं के खर्च पर सार्इं कृपा संस्थान को चलाया, लेकिन धीरे-धीरे लोगों ने डोनेशन देना शुरू किया। जिस जगह पर सार्इं कृपा संस्थान चल रहा है, उसका वह प्राधिकरण को पहले किराया देती थी। बाद में उनके मिशन से प्रवित होकर कॉडेन्स नाम की सॉफ्टवेयर कंपनी ने उसी वन को खरीदकर दे दिया। चार की करा चुकी हैं शादी कई लोग अपने बच्चों से मोह छोड़ देते हैं। उनको पढ़ाने की बात तो दूर उन्हें बेसहारा छोड़ देते हैं। तब बच्चे दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर हो जाते हैं। ऐसे बच्चों को अंजना रोजगापाल सहारा तो दे ही रही हैं बल्कि उन्हें पढ़ाने के अलावा उनकी शादी तक करवा रहीं हैं। वह अब तक चार लड़कियों की शादी करवा चुकी हैं। अंजना रोजगापाल बताती हैं कि शादी होने के बाद वे लड़कियां उसी प्रकार यहां आती हैं जैसे कोई लड़की शादी के बाद अपने घर आती-जाती रहती है। बचपन में बच्चों कोग मांगते देखना बहुत बुरा लगता था। तब ही मैंने ठान लिया था कि बेसहारा बच्चों के लिए काम करूंगी। इस काम से काफी सुकुन मिलता है। अन्य लोगों को इसके लिए आगे आना चाहिए। अगर, अधिक से अधिक लोग यह बीड़ा उठाएंगे तो बेसहारा बच्चे अपनी जिदंगी को संवार सकेंगे अंजना राजगोपाल, कार्यकारी निदेशक, सार्इं कृपा संस्थान मैं चार साल से सार्इं कृपा संस्थान में गार्ड की नौकरी कर रही हूं। मुझे यह देखना बहुत अच्छा लगता है कि यहां रहने वाले बेसहारा बच्चे कितने सहजव से रहते हैं। उनका इस तरह पालन-पोषण किया जाता है कि शायद ही उन्हें अपने मां-बाप की कमी महसूस होती होगी गायत्री देवी, सुरक्षा गार्ड यह बहुत अच्छा मिशन है क्योंकि इससे उन बच्चों की जिदंगी को एक आयाम मिल रहा है, जो दुर्ग्य से बचपन में ही बेसहारा हो जाते हैं। हर कोई ऐसे बच्चों को सहारा देने का बीड़ा उठा लें तो समाज में कोई बिना छत के नहीं रहेगा सेवक लाल, धोबी

 
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