उत्तराखंड : धुएं में ओझल थी नैसर्गिक सुंदरता
14/5/2016
NationalDuniya

उत्तराखंड : धुएं में ओझल थी नैसर्गिक सुंदरता

बिशन पपोला
पहाड़ जाने का संयोग बनता है तो दिमाग में
नैसर्गिक सुन्दरता का कौंधना लाजिमी होता है।
जब इसके विपरीत स्थिति दिख्ो तो स्वयं की
आंखों पर भी भरोसा करना थोड़ा मुश्किल हो
जाता है। पिछले दिनों मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही
हुआ। अचानक अपने गृह जनपद अल्मोड़ा
जाना हुआ। पर्वत श्रृंखलाओं, हरे-भरे पेड़-
पौधों, सीढ़ीनुमा ख्ोत-खलिहानों और हिमालय
की तस्वीर अनायास दिमाग में कौंधने लगी थी।
एक उत्सुकता सी बन गई थी, आसमान छूते
पर्वत श्रंृखलाओं, हिम से ढंके पर्वतों, ख्ोत-
खलिहानों को देखने की। इस उत्सुकता में यह
भूल गया था कि पहाड़ के जंगल तो आग से
धधक रहे हैं।
जब हल्द्बानी से आगे का सफर शुरू हुआ तो
पर्वत श्रंृखलाओं और हिमालय को देखने की
उत्सुकता जैसे काफूर-सी हो गई थी। आंख्ों
चौंधिया-सी गई थी। दिमाग में जंगलों में लगी
भीषण आग का मंजर कौंधने लगा। ये क्या
तस्वीर हो गई है खुबसूरत पहाड़ की? कहां
खो गई है नैसर्गिक सुन्दरता ? कहां ओझल हो
गई है हिम से ढंके पर्वतों की श्रृंखला ? कुछ ऐसे
सवालों की झड़ी दिमाग में उठने लगी।
बस धुंध की गाढ़ी रेखाएं चारों ओर फैली
हुई नजर आ रही थी। सच में, नैसर्गिक सुन्दरता
आग से पैदा हुए धुंध में ओझल-सी हो गई थी।
एक अजीब-सी बेरुखी शांत और स्तब्धता को
चीर रही थी जैसे। पर्वत श्रंृखलाओं को देखने के
लिए भी आंखों को जबरदस्त संघर्ष करना पड़
रहा था। सामने बस नजर आ रही थी तो काली
डामर की अजगर जैसी सड़क। उसमें दौड़ती
गाड़ियां। कई बार तो रफ्तार में ही गाड़ियां
ठिठककर रुक जातीं, क्योंकि सड़कें भी
कंकड़-पत्थरों से पूरी तरह पट चुकी थीं। कहीं
ऊपर से पत्थर न आए... संभाल के... जैसी
बातें जब अनायास ही लोगों के मुंह से निकलती
तो एक जोर के ब्रेक के साथ गाड़ी सहम-सी
जाती। धंुध में काली राख और धूल के ऐसे
कण तैर रहे थ्ो, जिसने नैसर्गिकता से मिलने
वाली ताजगी को उलाहना और व्याकुलता में
तब्दील कर दिया था। कई किलोमीटर आगे
बढ़ने के बाद मुश्किल से पहाड़ नजर भी आ रहे
थ्ो तो वे जर्जर, वीरान, काले और बदसूरत लग
रहे थ्ो। पेड़-पौध्ो व झाड़ियां दम तोड़ती हुई नजर
आ रही थी। जगह-जगह पानी के टैंकर खड़े थ्ो,
सड़कों को घ्ोरे हुए। जिनसे जुड़ा लंबा सा पाइप
प्राकृतिक स्रोतों में घुसाया गया था पानी भरने के
लिए। हेलीकाप्टर में नैनी झील और भीमताल से
पानी भरने की और उस पानी को आग से
धधकते हुए जंगलों में छिड़कने की जद्दोजहद
भी खूब दिख रही थी। कई हजार लीटर पानी
भरा गया नैनी झील और भीमताल से, जिसके
चलते झील में भी पानी बेहद कम हो गया था।
झील के किनारे भी सपाट और सूख्ो नजर आ रहे
थ्ो। झील से हेलीकाप्टर में पानी भरने का क्षण भी
लोगों के लिए एक अलग कौतूहल उत्पन्न कर
रहा था। आग की विभीषिका हर जगह नजर आ
रही थी। आग की भयानकता का अंदाजा इसी
से लग रहा था कि लगभग 2269 हेक्टेयर
जंगल जलकर राख हो गया। लोग यही बता रहे
थ्ो कि पौड़ी, नैनीताल, रूद्रप्रयाग और टिहरी के
जंगल तो कुछ ज्यादा ही वीरान हो गए हैं। और
वीरानी के बीच फैली धंुध एक अजीब सा डर
पैदा करने लगी है। जले पेड़ खामोश हो गए हैं।
पहाड़ में बारिश न हुई होती तो शायद आग
जंगलों को और भी बदसूरत कर देती। नुकसान
कई गुना ज्यादा हुआ होता। लोगों ने बताया कि
केन्द्र और राज्य सरकार की टीमें भी आग बुझाने
में हांफती हुई नजर आई। उनमें यह शिकायत
आम दिखी कि जिन्हें पहाड़ों में चलना नहीं
आता वे क्या आग बुझाते ? अगर इस काम में
स्थानीय लोगों को शामिल किया जाता तो शायद
आग पहले ही बुझा ली जाती। यह तो शुक्र रहा
कि बारिश हो गई, जिसमें आग बुझ गई।
गांवों के नजदीक पहुंचने पर तो हरे-भरे
सीढ़ीनुमा ख्ोतों के प्रति उठने वाला कौतूहल
भी कहीं खो सा गया था, क्योंकि सख्त, जर्जर
हो आए ख्ोतों से बस सफेद राखनुमा धूल उड़
रही थी, हवा के हल्के से झोंके के साथ। धूल भी
दूर तलक उड़ती और क्षण भर में ही जैसे धुंध में
विलीन हो जाती।
देवभूमि की यह तस्वीर नैसर्गिकता से
कितनी अलग थी। निराश और उदास करने
वाली। जगंलों की वीरानी, उदासी एक अजीबसी
बेरुखी को प्रदर्शित कर रही थी। जंगलों में
हरी घास का नामो-निशान नहीं था। दूर तक
बस उजाड़ से जंगल और भीषण आग में नष्ट हो
गए पेड़-पौध्ो ही नजर आ रहे थ्ो।
सूख्ो के चलते नदियों का कल-कल छल-
छल कर बहने वाला पानी भी बस रेंग रहा था,
एक संकुचित दिशा में। नदियों के चौड़े किनारे
भी व्यथित से लग रहे थ्ो। बड़े-बड़े पत्थरों और
रेतीली मिट्टी के सिवा कुछ न था चौड़े किनारों
पर। नदियों के पानी की रफ्तार भी अपनी
निरंतरता को भूलती नजर आ रही थी। सूख्ो
नौले और नौलों पर पानी भरने के लिए लगी
कतार, सूखे की अजब कहानी बयां कर रही
थीं। नदियों के उद्गम स्थल में इस तरह पानी का
संकट। यह सब विश्वास करना कितना
मुश्किल था। पहाड़ों में पानी का संकट, सूख्ो की
मार झेल रहे विदर्भ और बुंदेलखंड की याद
दिला रहा था। टैंकरों के आगे पानी भरने के
लिए जुटी भीड़। लोगों के चेहरों पर थकान और
उदासी के अजीब-से भाव, जो एक पीड़ा को
प्रदर्शित कर रहे थ्ो। वैसे तो उत्तराखंड के जंगलों में आग लगने
की घटनाएं हर साल आम रहती हैं, लेकिन इस
बार तो आग के अलावा सूख्ो की भी कुछ
अलग ही स्थिति दिखी। सूख्ो ख्ोतों के अलावा
पहाड़ भी हरियाली विहीन हो गए। पीने के पानी
और मवेशियों के लिए चारे का संकट अलग से।
इस पीड़ा में डूबे लोग यही कहते दिख्ो, पता
नहीं क्या होगा इस पहाड़ का ? ऐसे में शहरों को
पलायन नहीं करेंगे तो और क्या? मजबूरी है
यहां के लोगों की?
सूख्ो से जूझ रहे लोगों को वास्तव में
उत्तराखंड के जंगलों में लगी भीषण आग ने
एक अलग अनुभव दिया। जूझने का और
जीवन के संघर्ष को जारी रखने का। उनके
चेहरों पर मायूसी और उदासी के बीच भी एक
आत्मविश्वास की लकीर छुपी हुई नजर आ
रही थी। एक उत्सुकता, एक उमंग, एक
लालसा उनके संघर्ष में छुपी हुई थी। जर्जर,
सूख चुकी थाती पर फिर से ख्ोती करने की
लालसा। एक अलग सा संघर्ष ही सही, पर एक
उम्मीद की किरण भी। इस बात को लेकर कि
फिर से पहाड़ हरियाली से खिल उठेंगे। पेड़-
पौधों, ख्ोत-खलिहानों और पर्वतों श्रृंखलाओं
का यौवन फिर से लौट आएगा। फिर से
नैसर्गिक सुन्दरता से भरपूर पर्वत श्रृंखलाओं
की वादियों में ताजगी विचरण करने लगेगी।
पहले की तरह..

 
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